-विशाल स्वरुप

मुहर्रम का महीना 1 सितम्बर से शुरू हुआ। इस महीने में शिया मुस्लिम इमाम हुसैन और उनके 71 साथियों की शहादत का गम मनाते हैं। 1 सितम्बर से ही शहर के शिया बहुल इलाकों दालमंडी, नई सड़क, पितरकुंडा, दोषीपुरा, चौहट्टा लाल खां, बजरडीहा, मदनपुरा, अर्दली बाज़ार, रेवड़ी तालाब, लल्लापुरा और लाट सरैयां पर मजलिसों और जुलूसों का दौर शुरू हो जाता है और मोहर्रम के 8 वीं और 9वीं को उस्ताद मासतमी धून बजाते हुए करबला में आंसुओं का नजराना पेश किया करते थे। परंपरा तो आज भी है मगर अब वो उस्ताद वाली बात कहां है, उनकी शहनाई और गमगीन धुन के लिए लोग उनकी प्रतिक्षा में खड़े रहते थे।

इस संदर्भ में उस्ताद के उपर लगातार रिसर्च करने वाले लेखक मुरली मनोहर श्रीवास्तव उस पल को यादकर आज भी गमगीन हो जाते हैं। कहते हैं कि उस्ताद के साथ इस पल का श्री मुरली चश्मदीद हुआ करते थे। लेकिन अब उस जगह नहीं जा पाते हैं मगर इस दिन को याद उनकी गिली जरुर हो जाती हैं। उस्ताद बिस्मिल्लाह खां अपने शुरुआती दौर से ही मातमी धुम को बजाते हुए पूरे शहर का भ्रमण करते हुए कर्बला पर जाकर धुन को छेड़ते थे जिसकी धुन को सुनने के बाद किसी के आंखों से आंसु रुकने का नाम नहीं ले रहा होता था।

शहर के शिया बहुल इलाके दालमंडी में स्थित वक्फ मस्जिद व इमामबाड़ा खास मीर इमाम अली व मेहंदी बेगम, गोविंदपुरा कलां से अलम का जुलूस उठेगा। यह जुलूस अपने पारम्परिक रास्तों हड़हा सराय, नारियल बाज़ार, चौक, दालमंडी होते हुए हकीम काज़िम साहब के इमामबाड़े पहुंचेगा, जहां से अंजुमन हैदरी चौक बनारस नौहा व मातम करेगी। जुलूस अपने कदीमी रास्तों नई सड़क, शेख सलीम फाटक, कालीमहाल, पितरकुंडा, लल्लापुरा होते हुए फातमान पहले की तरह इस बार भी पहुंचा। साथ ही जुलूस में उस्ताद बिस्मिल्लाह खां की परम्परा को कायम रखते हुए उस्ताद फ़तेह अली खां पूरे रस्ते जुलूस के आगे शहनाई पर नज़राना ए अक़ीदत पेश करेंगे। अब इस मौके पर शहनाई तो बजती है, दर्द भी होती है मगर आज भी उस्ताद को नजरें ढूंढ़ने का प्रयास करती हैं। कभी-कभी तो लगता है कि उस्ताद यहीं कहीं मौजूद हैं।

   (लेखक चिंतक और समाजसेवी हैं)