जनता की पाकेट से भरा जाता है विधायकों का इनकम टैक्स

आलेख

-मनोज कुमार श्रीवास्तव

  • अच्छे दिन तो विधायकों के लिए है,आम जनता के लिए नहीं। दिन- रात अपनी खून पसीना बहाने वाले मजदूर हो या अधिकारी या कारोबारी सभी को अपने सलाना आय पर इनकम टैक्स देना पड़ता है।लेकिन आश्चर्य इस बात का है कि विधायकों को वार्षिक आय पर इनकम टैक्स नहीं देना पड़ता है। आम जनों का कहना है कि नियम-कानून जनप्रतिनिधि बनाते हैं और
  • खुद आम जनता इसका अनुकरण कैसे करेगी।
    चाहे प्रतिनिधि,कारोबारी या आम जनता हो यदि टैक्स के दायरे में आते हैं तो यह कानून सब पर लागू होना चाहिए।इस सम्बंध में आम जनता अलग-अलग
    विचार व्यक्त किया है।प्रो0 पी0 एल0 वरनवाल का कहना है कि जब एक साधारण व्यक्ति अपने वार्षिक
    आय पर इनकम टैक्स देता है तो जनप्रतिनिधिओं को
    टैक्स देना चाहिए क्योंकि नियम कानून सबके लिए एक जैसा होता है।नियम बनाने वाले जनप्रतिनिधि हीं है।प्रो0 डॉ0 एस0 पी0 शर्मा का कहना है कि,लोकतंत्र टैक्स से चलता है।यदि इनकम टैक्स सांसद-विधायक नहीं देते हैं तो जुर्म है।वार्षिक आय पर टैक्स देना इनकी पहली जिम्मेदारी बनती है।
    भारत में पहला बजट ईस्ट इंडिया कम्पनी के जेम्स विल्सन ने 18 फरवरी 1860 को पेश किया था।इन्हें भारतीय बजट व्यवस्था का जनक भी कहते हैं।इसी बजट में इनकम टैक्स कानून को जोड़ा गया था।जेम्स विल्सन ब्रिटेन के चार्टर्ड स्टैंडर्ड बैंक के संस्थापक और अर्थशास्त्री थे।1857 में भारत ईस्ट इंडिया कम्पनी के खिलाफ भारतीय सैनिकों ने बगावत की थी।इसके बाद देशभर में आंदोलन शुरू हो गया था।इससे निपटने के लिए अंग्रेजों ने अपनी सेना पर खर्च बढ़ा दिया।इसी क्रांति की वजह से 1859 में इंग्लैंड के कर्ज 8 करोड़ 10 लाख पाउंड पहुंच गया।इससे निपटने के वास्ते जेम्स विल्सन उसी साल भारत भेजे गए।उन्होंने तीन टैक्स का प्रस्ताव दिया।इनकम टैक्स,लाइसेंस टैक्स और तम्बाकू टैक्स।
    यूपी में मंत्रियों पर मेहबानी का ये कानून 1981 , उत्तराखंड वर्ष 2000 में यूपी से अलग होने के बावजूद इस कानून में बदलाव की जरूरत नहीं समझी।रिपोर्ट के मुताबिक हरियाणा और हिमाचल प्रदेश में मंत्रियों को टैक्स माफी का कानून 1966 का है और मध्यप्रदेश में 1994 से।पंजाब भी इन राज्यों की श्रेणी में रहता यदि पिछले साल तक मिलने वाली ये सुविधा खत्म न कर दी जाती।
    वर्ष 1981 से उत्तर प्रदेश अपने मंत्रियों के वेतन का इनकम टैक्स सरकारी खजाने से भर रही है।जानकारों
    का कहना कि मेडिकल भत्ता,सचिवीय भत्ता भी कर योग्य आय माना जाता है।आवासीय सुविधा के एवज में आवास के वार्षिक वैल्यू के आधार पर इनकम टैक्स अदा किया जाता है जबकि निर्वाचन क्षेत्र भत्ता, प्रतिदिन दैनिक भत्ता इनकम टैक्स के दायरे से बाहर है।जब यह व्यवस्था लागू की गई थी उस समय कांग्रेस की वी.पी.सिंह सरकार थी। वी.पी.सिंह विधायकों की गरीबी और माली हालत का हवाला देते हुए सरकारी खजाने से इनकम टैक्स अदा करने की व्यवस्था की थी।उस जमाने में विधायक सादगी की मिसाल मने जाते थे।तब से विधायकों व मंत्रियों के ठाटबाट में बड़ा बदलाव आ चुका है,तब से आजतक किसी ने इसकी समीक्षा नहीं की।
    आम आदमी पार्टी ने राज्यसभा में मांग की थी कि जिस दिन सदन की कार्रवाई स्थगित हो सदस्यों को उस दिन का भत्ता नहीं दिया जाना चाहिए।आप के राज्यसभा सांसद संजय सिंह ने इस मुद्दे को लेकर सदन में पत्र लिखा था।देश की औसत आय से 68 गुणा ज्यादा वेतन (और भत्ते)पाते हैं।इसके अलावे दुनिया के की देशों से उलट उन्हें निजी व्यापार से असीम दौलत कमाने की सुविधा भी भारत में मिली हुई है।सबसे अहम बात की सांसदों की यह आमदनी टैक्स के प्रावधानों से मुक्त है यानी सांसदों को अपने वेतन और भत्तों पर टैक्स नहीं भरना पड़ता है।
    खबरों के मुताबिक उतराखण्ड , मध्यप्रदेश, पंजाब,हिमाचल प्रदेश और हरियाणा के मंत्री भी टैक्स के बोझ से मुक्त है।जब इनकम टैक्स विभाग पाई-पाई पर नजर रखने का दावा करता है और आये दिन उसके छापों और अभियानों की खबरें आती रहती हैं और नागरिकों को समय पर टैक्स भरने की हिदायतें और मशविरे दिए जाते हैं तो हैरानी की बात है कि यूपी जैसे बड़े राज्य के मंत्रियों का इतना बड़ा बोझ खजाने से निकाल कर ही भरा जा रहा था और ये सब करीब 40 साल पहले बने एक कानून के चलते हो रहा था।टाइम्स ऑफ इंडिया अखबार में खबर आने के बाद यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने आदेश निकाला कि इस कानून को वापस लिया जाएगा और अब मुख्यमंत्री सहित सभी मंत्री अपना टैक्स खुद भरेंगें।
    बिहार में 250 से अधिक उम्मीदवार को इनकम टैक्स विभाग नोटिस किया है।हिमाचल प्रदेश सरकार विधायकों के वेतन पर इनकम टैक्स अदा करती है।कोरोना महामारी दरम्यान देश आर्थिक संकट के दौर से गुजर रहा है।सरकारी खजानों की स्थिति अभी सुधरी नहीं बावजूद शिवराज सरकार अपने मंत्रियों पर मेहरबान हैं।सवाल इस बात का है कि जहां एक ओर महंगाई भत्ता,वेतन,बढ़ोतरी,एरियर तक रोक दिया गया , कोरोना काल में भी 1लाख 70 हजार से ज्यादा हर महीने सैलरी पाने वाले मंत्री जी की टैक्स भी सरकारी खजाने से भरा जा रहा है।

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