ग्राउंड रिपोर्ट: द इंक
पटना: चुनावी चौसर पर विरोधी चाहे जितनी भी बिसात बिछा लें, चक्रव्यूह चाहे जितना गहरा हो, लेकिन जब जनता से दिल का रिश्ता हो तो हर विरोधी रणनीति रेत की दीवार साबित होती है। बिहार विधान परिषद के पटना शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र में आज यही सियासी सच्चाई खुलकर सामने आ रही है। लंबे समय से इस क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते आ रहे प्रो. नवल किशोर यादव के खिलाफ विरोधियों ने पूरी ताकत झोंक रखी है, लेकिन चुनावी अखाड़े में वे अपने हर प्रतिद्वंद्वी पर बेहद भारी पड़ रहे हैं। वजह साफ है-वे केवल चुनावों में दिखने वाले मौसमी नेता नहीं, बल्कि शिक्षकों के सुख-दुख में सातों दिन और चौबीसों घंटे साथ खड़े रहने वाले सच्चे पहरेदार हैं।
‘द इंक’ की टीम ने जब पटना शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले विभिन्न जिलों, शिक्षण संस्थानों और शिक्षकों के बीच जाकर जमीनी नब्ज टटोली, तो एकतरफा तस्वीर उभरकर सामने आई। शिक्षकों ने दो टूक कहा-“हमारा नेता वही, जो हमारे सम्मान और हक के लिए हर वक्त खड़ा रहे।”
सड़क से सदन तक सिर्फ एक ही गूंज-प्रो. नवल किशोर यादव
प्रो. नवल किशोर यादव की सबसे बड़ी पूंजी उनकी सहज कार्यशैली और जमीनी पहुंच है। वे लगातार अपने क्षेत्र के शिक्षण संस्थानों में शिक्षकों के बीच अपनी उपस्थिति दर्ज कराते रहे हैं। किसी भी शिक्षक पर कोई प्रशासनिक संकट आया हो, सेवा शर्तों का पेंच फंसा हो या मान-सम्मान की बात हो-प्रो. यादव हमेशा सड़क से लेकर उच्च सदन तक सबसे आगे ढाल बनकर खड़े मिले हैं।
उनकी सबसे बड़ी खूबी यह रही कि वे कभी जाति, संप्रदाय या दलीय संकीर्णताओं के दायरे में नहीं बंधे। प्राथमिक विद्यालय से लेकर विश्वविद्यालय स्तर तक के हर शिक्षक के लिए वे एक सर्वमान्य, सुलभ और भरोसेमंद अभिभावक के रूप में स्थापित हुए हैं।
44 वर्षों का ऐतिहासिक वनवास खत्म: वित्तरहित शिक्षकों की तकदीर संवारने का श्रेय
बिहार में वित्तरहित शिक्षक पिछले 44 वर्षों से उपेक्षा, अनिश्चितता और आर्थिक बदहाली का दंश झेल रहे थे। कई सरकारें आईं और गईं लेकिन इन शिक्षकों के दर्द को किसी ने नीतिगत समाधान तक नहीं पहुंचाया।
प्रो. नवल किशोर यादव ने इसे अपने राजनीतिक और सामाजिक जीवन का सबसे बड़ा संकल्प बनाया। उन्होंने सदन के पटल पर तर्क, तथ्य और संवेदनशीलता के साथ सरकार के सामने वित्तरहित शिक्षकों के मसले को इतनी मजबूती से रखा कि सरकार को झुकना पड़ा। प्रो. यादव की अथक पहल और निरंतर दबाव का ही सुखद परिणाम रहा कि सरकार ने वित्तरहित शिक्षकों की मांगों को स्वीकार करते हुए उनकी तकदीर संवारने का ऐतिहासिक निर्णय लिया।
शिक्षक समाज का एकतरफा ऐलान: ‘सिर्फ जीत नहीं, इस बार रिकॉर्ड जीत होगी’
44 वर्षों के लंबे संघर्ष को मुकाम तक पहुंचाने के बाद पूरे शिक्षक समाज में प्रो. नवल किशोर यादव के प्रति आभार और सम्मान की लहर दौड़ गई है। शिक्षक समुदाय अब उन्हें सिर्फ एक एमएलसी नहीं, बल्कि अपना वास्तविक उद्धारक और सबसे बड़ा हिमायती मान रहा है।
‘द इंक’ की पड़ताल में शिक्षकों ने स्पष्ट संदेश दिया है कि विरोधी चाहे जितने लुभावने वादे कर लें या जोड़-तोड़ कर लें, पटना शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र का शिक्षक समाज कृतघ्न नहीं हो सकता। जिस नेता ने जीवन भर शिक्षकों के स्वाभिमान के लिए पसीना बहाया, उसे एक बार फिर भारी बहुमत के साथ जिताकर बिहार विधान परिषद भेजना ही शिक्षक समाज का अंतिम और अटल फैसला है।

