डुमरांव (बक्सर): प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश सह अध्यक्ष हर्षित सिंह, अवर न्यायाधीश सह सचिव नेहा दयाल जिला विधिक सेवा प्राधिकार बक्सर के मार्गदर्शन में “आदिवासी अधिकार संरक्षण एवं प्रवर्तन योजना 2015 “के सम्बंध में विधिक जागरूकता शिविर का आयोजन डुमरांव प्रखंड के चतुरसालगंज में पैनल अधिवक्ता मनोज कुमार श्रीवास्तव एवं पीएलवी अनिशा भारती द्वारा किया गया।मौके पर वार्ड पार्षद सुभद्रा देवी,प्रेमनाथ चौधरी, ढोंढा चौधरी, सुनील कुमार, रमेश कुमार, भृगुनाथ चौधरी उपस्थित रहे।
पैनल अधिवक्ता मनोज श्रीवास्तव ने लोगों को समझाते हुए कहा कि आदिवासी हमारी सांस्कृतिक धरोहर है।आदिवासियों के भूमि,जाति, धर्म, इज्जत,आबादी, रोजगार और आत्मनिर्भर आदि अधिकारों का संरक्षण एवं संवर्धन आवश्यक है।उनके अधिकारों के संरक्षण व प्रवर्तन के लिए जिला विधिक सेवा प्राधिकार प्रतिबद्ध है।उन्होंने यह भी कहा कि आदिवासियों की एकजुटता व आगे बढ़ाने के लिए आदिवासी समाज के भीतर विधमान नशापान, अंधविश्वास, ईर्ष्या, द्वेष आदि बुराइयों से मुक्त होने की आवश्यकता है।आदिवासियों के अधिकारों का संरक्षण एवं प्रवर्तन योजना 2015 नि:शुल्क विधिक सहायता,घरेलू हिंसा एवं नशामुक्ति के सम्बंध में जानकारी दिया गया।
पीएलवी अनिशा भारती ने बताया की आदिवासियों के अधिकार का संरक्षण आवश्यक है।कि कानून एवं एक्ट होने के बावजूद उन्हें संरक्षण नहीं मिल पा रहा है।आदिवासियों तक अधिकार पहुंचाने व योजनाओं का लाभ प्रदान करना सभी की जिम्मेदारी है।
नालसा की योजनाएं कानून पर आधारित है।इसे आमजनों तक पहुंचाया जाना है।कानून की जानकारी के अभाव में आदिवासी अपराध कर बैठते हैं।उन्हें कानून की जानकारी देनी होगी इससे वह अपने अधिकारों के प्रति जागरूक होंगे।जागरूकता से ही आदिवासियों की हित की रक्षा होगी।
मनोज श्रीवास्तव ने बताया कि वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार अनुसूचित जनजातियों की कुल जनसंख्या 10,42,81,034 है जो देश की जनसंख्या की 8.6% है।जनजातियों के साथ सम्मानजनक व्यवहार नहीं होने के कारण वे स्वंय को मुख्यधारा से कटे हुए समझते हैं।जनजातियों में साक्षरता की कमी मुख्य समस्या है।परिणाम स्वरूप आदिवासी अपने मौलिक विधिक एवं संवैधानिक आधी8 से वग्ग नहीं रहती।वे अपने कल्याण हेतु सरकार द्वारा चलाये गए कल्याणकारी योजनाओं के ज्ञान भी नहीं रखते जिसके चलते वे उनमे शामिल नहीं होते।
योजना आयोग के अध्ययन से स्पष्ट होता है कि 43.6% पुनरुद्धारित बंधुआ मजदूर आदिवासी वर्ग से आते हैं।।आदिवासियों को उनकी भूमि,वास,जीविका, राजनैतिक व्यवस्था, सांस्कृतिक, मुल्यों एवं पहचान से वंचित करके प्रत्यक्ष रूप से भी बेदखली होती है एवं विकास के लाभों और उनके अधिकारों को न देने के रूप में अप्रत्यक्ष रूप से भी होती है।
पैनल अधिवक्ता मनोज श्रीवास्तव ने कहा कि भारतीय संविधान में आदिवासी तथा जनजातीय समुदायों के अधिकारों की रक्षा के लिए प्रावधान किये गए हैं।संविधान की 5 वीं और 6 ठी अनुसूची में अनुसूचित और जनजातीय क्षेत्रों के प्रशासन तथा नियंत्रण की बात ही है।अनुच्छेद 342(1) सम्बंधित राज्य अथवा केंद्र शासित राज्यों के सम्बंध में जनजातियों व आदिवासियों समुदायों को अनुसूचित जनजाति के रूप में निर्दिष्ट किया गया है।इसके अलावे अनुच्छेद 15 तथा 16 उनके साथ किसी भी प्रकार के भेदभाव का निषेध करने तथा लोकनियोजन के मामले में अवसर की समानता देने की बात कहते हैं।अनुच्छेद 46 के तहत अनुसूचित जनजातियों, अनुसूचित जातियों और अन्य कमजोर वर्गों के शैक्षिक और आर्थिक हितों को सुरक्षित किया गया है।अनुच्छेद 335 एवं 338 ए के तहत राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग की स्थापना की गई है और अनुसूचित जातियों तथा जनजातियों के सरकारी नौकरी पाने के अधिकार को सुरक्षित किया गया है।

