पटना: – बिहार विधान परिषद के वरिष्ठ सदस्य प्रो. नवल किशोर यादव ने डॉ. संजीव कुमार सिंह द्वारा भाजपा और उनके ऊपर लगाए गए ‘फर्जी वोटिंग’ के आरोपों पर कड़ा प्रहार किया है। प्रो. यादव ने कहा कि चुनावी मैदान में उतरने से पहले ही डॉ. संजीव ने अपनी तयशुदा हार स्वीकार कर ली है और अब खिसियानी बिल्ली की तरह बेबुनियाद व हास्यास्पद बयानबाजी कर रहे हैं।
प्रो. नवल किशोर यादव ने सीधे तौर पर हमला बोलते हुए कहा, जब चुनाव सामने आता है और पैरों तले से जमीन खिसकती दिखती है, तो हताश और दिशाहीन नेताओं को लोकतंत्र, चुनाव आयोग और मतदाताओं में ही खोट नजर आने लगता है। डॉ. संजीव का यह बयान उनकी राजनीतिक दरिद्रता और चुनावी भय का स्पष्ट प्रमाण है।
शिक्षक और स्नातक मतदाताओं का सीधा अपमान
प्रो. यादव ने दो टूक शब्दों में कहा कि शिक्षक और स्नातक निर्वाचन क्षेत्र में समाज का सबसे प्रबुद्ध, शिक्षित और जागरूक वर्ग मतदान करता है।
- प्रबुद्ध वर्ग की तौहीन: डॉ. संजीव यह कहकर कि फर्जी वोटों से जीत होती है, केवल भाजपा पर नहीं बल्कि पूरे शिक्षक समाज और प्रबुद्ध मतदाताओं की ईमानदारी और विवेक पर कीचड़ उछाल रहे हैं। क्या बिहार का शिक्षक फर्जी है? क्या प्रबुद्ध मतदाता बिके हुए हैं? डॉ. संजीव को अपने इस गैर-जिम्मेदाराना बयान के लिए राज्य के तमाम शिक्षकों और मतदाताओं से बिना शर्त माफी मांगनी चाहिए।
- संवैधानिक संस्थाओं पर अविश्वास: मतदाता सूची के निर्माण से लेकर मतदान प्रक्रिया तक चुनाव आयोग की सख्त निगरानी होती है। अपनी नाकामी और अलोकप्रियता का ठीकरा संवैधानिक संस्थाओं पर फोड़ना विपक्ष की पुरानी फितरत बन चुकी है।
‘बहानेबाजी छोड़ें, मैदान में आकर मुकाबला करें’
प्रो. नवल किशोर यादव ने डॉ. संजीव को नसीहत देते हुए कहा कि जनाधार विहीन नेता चुनाव से पहले ही हार का बहाना तैयार करने लगते हैं ताकि परिणाम आने के बाद ठीकरा ईवीएम या मतदाता सूची पर फोड़ा जा सके।
हम हवा-हवाई राजनीति नहीं करते। हमने शिक्षकों, वित्तविहीन कर्मियों, अतिथि प्राध्यापकों और शिक्षा जगत के हर तबके के मान-सम्मान और हक के लिए सदन से लेकर सड़क तक अनवरत संघर्ष किया है। जनता काम और निष्ठा पर मुहर लगाती है, अनर्गल प्रलाप पर नहीं। डॉ. संजीव मानसिक हताशा से बाहर आएं और अगर हिम्मत है तो काम के दम पर जनता के बीच जाएं, रोना रोने से वोट नहीं मिलता।

