डुमरांव (बक्सर)- सुमित्रा महिला महाविद्यालय डुमरांव में प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश सह अध्यक्ष हर्षित सिंह एवं अवर न्यायाधीश सह सचिव नेहा दयाल जिला विधिक सेवा प्राधिकरण बक्सर के मार्गदर्शन में पैनल अधिवक्ता मनोज कुमार श्रीवास्तव एवं पीएलवी अनिशा भारती द्वारा छात्राओं को मानवाधिकार दिवस,महिलाओं के मानवाधिकार से सम्बंधित विधिक जानकारी दी गई।जिसकी अध्यक्षता प्राचार्या डॉ0 शोभा सिंह एवं मंच संचालन डॉ0 सुभाष चन्द्रशेखर ने किया।मौके पर डॉ0 प्रमोद कुमार, डॉ0शम्भू नाथ शिवेन्द्र, प्रो0 अर्चना सिंह,पवन,मनीष,सुनीता कुमारी, धनवर्ती कुमारी,काजल कुमारी के अलावे अधिक संख्या में छात्राएं उपस्थित रहीं।
द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान हुए अत्याचारों ने दुनिया को मानव अधिकारों के महत्व को समझने के लिए मजबूर किया।युद्ध के बाद संयुक्त राष्ट्र की स्थापना हुई और मानव अधिकारों को सुरक्षित करने के लिए एक अंतरराष्ट्रीय ढांचा बनाने का प्रयास किया गया।।यूडीएचआर को इसी प्रयास का परिणाम माना जा सकता है।यह घोषणा सभी के लिए समान अधिकार देने की घोषणा करती है, जैसे जीवन का अधिकार, स्वतंत्रता का अधिकार,विचार व्यक्त करने का अधिकार और भेदभाव से मुक्ति का अधिकार।
पैनल अधिवक्ता मनोज श्रीवास्तव ने बताया कि द्वितीय विश्वयुद्ध के अत्याचारों से जन्मा और 1948 में अपनाया गया, मानवाधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा (यूडीएचआर) सार्वभौमिक मानवाधिकारों का दुनिया का पहला व्यापक विवरण था। यह घोषणा दुनिया भर के इतिहास में एक मिल का पत्थर है क्योंकि इसमें सभी लोगों को मौलिक अधिकार दिए गए हैं, चाहे उनकी पृष्ठभूमि कुछ भी हो। मानवाधिकार कानून की नींव के रूप में यूडीएचआर के अनुच्छेद 30 समानता और स्वतंत्रता से लेकर यातना से सुरक्षा तक प्रमुख स्वतन्त्रताओं को रेखांकित करते हैं और इसने 80 से अधिक अंतराष्ट्रीय सन्धियों को प्रेरित किया। मानवाधिकार दिवस हर साल दुनिया भर में 10 दिसंबर को मनाया जाता है।
प्राचार्या डॉ0 शोभा सिंह ने कहा कि मानवाधिकार सार्वभौमिक अधिकार है जिनका हर किसी को हकदार होना चाहिए।इसका मतलब हर किसी के साथ समान और सम्मान के साथ व्यवहार किया जाना चाहिए, चाहे वह किसी भी जाति, धर्म, लिंग,यौन या जिस देश में पैदा हुआ हो उससे कोई फर्क नहीं पड़ता।मानवाधिकार दिवस उन लोगों की उपलब्धियों का जश्न मनाने का एक मौका है, जिन्होंने मानवाधिकारों के लिए लड़ाई लड़ी।
भारत में 28 सितम्बर 1993 को मानवाधिकार कानून को अमल में लाया गया था और 12 अक्टूबर 1993 को राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग का गठन किया गया था।मानवाधिकार भारतीय संविधान के भाग-3 में मूलभूत अधिकारों के नाम से उल्लेखित है।इन अधिकारों का उल्लंघन करने वाले या हनन करने वाले को कानून में सजा का प्रावधान है।
मानवाधिकार दिवस 2024 का थीम है “हमारे अधिकार,हमारा भविष्य, अभी”।भारतीय संविधान, राज्य व केंद्र सरकार, पंचायती राज व्यवस्था आदि के माध्यम से महिलाओं पर होने वाले अपराध व अत्याचार के निदान के लिए निरंतर प्रयास किया जा रहा है।महिलाओं के प्रति हिंसा विश्वव्यापी घटना बनी हुई है जिससे कोई भी समाज एवं समुदाय मुक्त नहीं है।क्योंकि इसकी जड़ें सामाजिक प्रतिमानों एवं मूल्यों में जमी हुई है।
पीएलवी अनिशा भारती ने कहा कि भारत में महिला हिंसा के प्रति भयानक स्वरूप के विरुद्ध संघर्ष के लिए और जन जागृति पैदा करने के लिए व्यापक अभियान चलाया जा रहा है।भारत जैसे विकासशील देश में मानव अधिकार एक ऐसा मुद्दा है जिसके लिए दीर्घकालीन नीति तथा सरकार एवं सरकारी संगठन से सहयोग की जरूरत है।बदलते परिवेश में संविधान में 12 वें संशोधन द्वारा अनुच्छेद 51 के अंतर्गत नारी सम्मान को स्थान दिया गया और नारी सम्मान के विरुद्ध प्रथाओं का त्याग करने का आदर्श अंगीकृत किया गया है।राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग तथा राष्ट्रीय महिला आयोग नारी समान की रक्षा एवं सतत प्रयासरत है।

