पटना: बिहार में इस बार सतुआनी पर्व को बड़े स्तर पर मनाने की तैयारी की गई है। बिहार राज्य धार्मिक न्यास पर्षद ने निर्णय लिया है कि राज्य के सभी प्रमुख मठों और मंदिरों में सतुआनी का आयोजन किया जाएगा। इसके साथ ही यह पर्व केवल धार्मिक स्थलों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि दलित बस्तियों में भी कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे।
पर्षद के अध्यक्ष प्रो. रणबीर नंदन ने बताया कि इस बार सतुआनी को सामाजिक भागीदारी के साथ मनाने की योजना बनाई गई है। राज्य के अलग-अलग जिलों में मंदिरों के साथ बस्तियों में भी लोगों के बीच सत्तू और शर्बत का वितरण किया जाएगा। इसका उद्देश्य पर्व को समाज के हर वर्ग तक पहुंचाना है।
पटना में इस अवसर पर करीब 50 स्थानों पर विशेष काउंटर लगाए जाएंगे। इन केंद्रों पर लोगों के बीच सत्तू का शर्बत और सत्तू-गुड़ की गोली वितरित की जाएगी। राजधानी के कई प्रमुख मंदिरों, बाजारों और सार्वजनिक स्थलों को इसके लिए चिन्हित किया गया है। इनमें पटना जंक्शन हनुमान मंदिर, राजवंशी नगर पंचरुपी हनुमान मंदिर, पंचमुखी हनुमान मंदिर गौरेयामठ के निकट, बांसघाट के काली मंदिर, गर्दनीबाग ठाकुरबाड़ी, चांदपुर बेला शिवमंदिर, पूर्वी लोहानीपुर शिवमंदिर, निशा देवी मंदिर, दलदली सालिमपुरअहरा शिव मंदिर, बाकरगंज कला मंच, दरियापुर खेतान मार्केट, सब्जीबाग, मछुआ टोली अमरुदी गली के सामने मंदिर, गौरैयामठ मंदिर मीठापुर, कालीबाड़ी मंदिर दो पुलवा, शिव मंदिर रोड नंबर 1 सिपारा, चांदपुर बेला बजरंगबली मंदिर, दुर्गा मंदिर, पृथ्वीपुर चिरैयाटांड मारुति नगर मोड़, महावीर स्थान लोधीपुर, पटना हवेली राजा बाजार, दुर्गा मंदिर मंदिरी, दुजरा देवी स्थान, अनिसाबाद गोलम्बर, कौशल नगर हनुमान मंदिर, लाल मंदिर पटेल चौक, राजभवन एसबीआई के पास, सचिवालय मंदिर, शिवपुरी उड़ान टोला शिवमंदिर, श्रीश्री देवी मंदिर शिवपुरी चौक, शिव रामेश्वर मंदिर काली स्थान दादरमंदी, बेउर मोड़ काली मंदिर, जय प्रकाश नगर भोलेनाथ मंदिर, नाला रोड दरियापुर, कदमकुआं हिंदी साहित्य सम्मेलन, काली मंदिर बांसघाट, धनकी मोड़ शिव मंदिर के साथ दलदली, बाकरगंज, सब्जीबाग, मीठापुर, सिपारा, अनिसाबाद, पटेल चौक, सचिवालय, बांसघाट और कदमकुआं समेत कई इलाके शामिल हैं।
धार्मिक न्यास पर्षद के अनुसार सतुआनी बिहार और पूर्वी भारत के प्रमुख पारंपरिक पर्वों में शामिल है। यह पर्व लंबे समय से ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में मनाया जाता रहा है। इस दिन लोग सुबह स्नान के बाद भगवान शिव की पूजा करते हैं और सत्तू का भोग अर्पित करते हैं। इसके बाद सादा भोजन करने की परंपरा निभाई जाती है।
यह पर्व कृषि परंपरा से भी जुड़ा माना जाता है। नई फसल के आगमन के बाद किसान प्रकृति के प्रति आभार व्यक्त करते हैं। इसी कारण सतुआनी को नई उपज और श्रम के सम्मान का पर्व भी माना जाता है। गर्मी की शुरुआत के समय सत्तू जैसे ठंडे और पौष्टिक आहार के सेवन की परंपरा भी इसी दिन से जुड़ी है।
पर्षद का कहना है कि सतुआनी ऐसा पर्व है जो समाज के हर वर्ग में समान रूप से मनाया जाता है। इसे सामाजिक समरसता और सामूहिक भागीदारी का प्रतीक माना जाता है। इसी सोच के तहत इस बार कार्यक्रमों को मंदिर परिसरों से बाहर निकालकर बस्तियों और मोहल्लों तक ले जाने की तैयारी की गई है।
धार्मिक न्यास पर्षद ने लोगों से अधिक से अधिक संख्या में शामिल होने की अपील की है। माना जा रहा है कि इस पहल से इस बार बिहार में सतुआनी का आयोजन पहले की तुलना में अधिक व्यापक और संगठित रूप में देखने को मिलेगा। इससे पारंपरिक लोक पर्व को नई पहचान मिलने की उम्मीद है।

