– नीरज सिंह
आजकल हमारी जिंदगी में कई ऐसी चीज़ें हैं जिनके बिना हम अपने जीवन की कल्पना भी नहीं कर सकते। उन्हीं में एक है रुपया-पैसा यानी मुद्रा (currency). हम अपने पैसों को आभासी और वास्तविक दोनों तरीके से इस्तेमाल कर सकते हैं। पैसे का आदान-प्रदान भी नहीं होता और हमारे घर में बैठे-बैठे पिज़्ज़ा डिलीवर्ड हो जाता है। अगर हम बाजार भी जाते हैं, चीजों को खरीदने के लिए, तो कार्ड से भुगतान का विकल्प भी हमारे पास होता है। हम चाहें तो सारी दुनिया घूम कर आ सकते हैं बिना बहुत सारे पैसों को ढ़ोए बिना। लेकिन क्या यह सारी चीजें हमेशा से इतनी आसान थीं? कतई नहीं। शुरुआत में मानव की आर्थिक या व्यवसायिक जिंदगी निहायत ही सरल थी इसमें कोई दो मत नहीं। पर आने वाले दिनों में क्रमानुगत वह जटिल होती गई। शुरुआत में हमारी जरूरतें भी बहुत सीमित हुआ करती थीं। आजकल की तरह फैंसी, रंग-बिरंगे, महंगे कपड़ों की हमें जरूरत नहीं थी। हमें सिर्फ अपने शरीर को ढंकना होता था और उसके लिए आवश्यक चीज़ें गांव, कबीलों या जंगलों में भी सर्व-सुलभ हुआ करती थीं। भोजन भी हमारी आवश्यकता के अनुसार हमें मिल ही जाते थें। परिवहन के लिए घोड़े, रथ और बैलगाड़ी काफी थें। तब मुद्राओं का भी चलन नहीं था। हम आपस में चीजों के आदान-प्रदान के द्वारा ही इसकी कमी की भरपाई कर लिया करते थें। इसे बार्टर सिस्टम कहा जाता था। जैसे, एक बकरी देकर 6 मुर्गियां ले ली, एक अनाज से दूसरी अनाजों का आदान-प्रदान कर लिया, कुछ उपजाऊ जमीन दे दी और घोड़े, बैल या गाय ले लिए। मजदूरों को भी उनकी मज़दूरी के एवज में चीज़ें मिल जाया करती थीं। पर जैसे-जैसे वक्त बीतता गया और चीज़ें उतनी आसान नहीं रहीं, वैसे-वैसे एक खास भौगोलिक परिवेश में मुद्रा की जरूरत महसूस की जाने लगी। तब देशों और महादेशों ने भी आकार लेना शुरू कर दिया था।
शुरुआती मुद्रा का चलन भी कुछ अटपटा और बेतरतीब ही था। इसके लिए भी हम मुख्यतः प्रकृति पर ही निर्भर थें। लगभग पहली शताब्दी ईसा पूर्व से पहले कौड़ी का चलन मुद्रा के रूप में शुरू हुआ था। आजकल हम लोग बातों-बातों में कहते हैं कि मैं तुम्हें फूटी कौड़ी भी नहीं दूंगा। सचमुच में कभी फूटी कौड़ी भी पैसों के रूप में चलाएमान थी। अपने शुरुआती दिनों में मुद्रा के रूप में कौड़ी को हाथों हाथ लिया गया। यह छोटे भी होते थें, एक आकार के भी होते थें और टिकाऊ भी होते थें। इन्हें एक जगह से दूसरी जगह ढ़ोना भी आसान था। यह हिंद और प्रशांत महासागर के तटीय इलाकों में बहुतायत से पाए जाते थें। एक समय इनका प्रचलन इतना अधिक हो गया था कि यूरोपियन देशों ने भी इनको स्वीकार करना शुरू कर दिया था। जहां तक मुद्रा के रूप में धातु के चलन का सवाल है, 4000 साल से भी पहले बेबीलोन में इसकी शुरुआत होती है। इसके बावजूद मानकीकृत (standardised) और प्रमाणिक (certified) धातु की मुद्रा का चलन सातवीं शताब्दी ईसा पूर्व से पहले शुरू नहीं हो सका था। लगभग इसी दौरान लीडिया के राजतंत्र, जो कि वर्तमान तुर्की के तहत आता है, ने सर्वप्रथम विनियमित (regulated) मुद्रा को चलन में लाया। सोने और चांदी की मुद्रा को सर्वप्रथम ज्यादा तरजीह दी गई।
लगभग 26 सौ साल पहले के प्राचीन रोम से लेकर 18 वीं शताब्दी के पूर्वार्ध के पीटर महान के रूस तक जानवरों के चमड़े भी मुद्रा के रूप में इस्तेमाल किए जाते रहे हैं। दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व के चीन के शासक वूडी ने अपने व्यक्तिगत संग्रह के सफेद बारहसिंघों (white stag) की खाल से तैयार मुद्रा को चलन में लाया। शायद यही कारण है कि आज हम अमेरिकी मुद्रा को बक (buck या हिरण) भी कहते हैं।
हम सब जानते हैं कागज का आविष्कार मूलतः चीन में हुआ था। अतः कागज की मुद्रा का चलन भी सर्वप्रथम 10वीं-11वीं सदी में चीन में हुआ तो इसमें कुछ अतिशयोक्ति नहीं लगती है। इनका निर्माण मलबरी के पेड़ों की छाल से किया जाता था। इसका मतलब यह भी हुआ कि कभी पैसे सचमुच में पेड़ों पर उगा करते थें। 19वीं शताब्दी के आते-आते मुद्रा के लिए कागज का चलन लगभग सारे देशों में शुरू हो चुका था। तब तक आधुनिक तरीके से बने हुए कागज भी अच्छी क्वालिटी के एवं टिकाऊ हुआ करते थें। यह दूसरे मायने में रुपए-पैसे के मामले में एक क्रांतिकारी बदलाव का द्योतक भी था। क्योंकि पहले आदान-प्रदान में सोने और चांदी के सिक्कों का प्रचलन था। पर यहां तो सिर्फ कागज के टुकड़ों का हस्तांतरण हो रहा था। हम कह सकते हैं यह एक वचन पत्र (promissory notes) था। जिसके अनुसार धारक को नोट के वैल्यू के अनुपात में सोने या चांदी देने का वचन तत्कालीन सरकार देती थी। इस प्रकार दूसरे तरीके से भविष्य के बैंकों के बनने की प्रक्रिया की शुरुआत भी यहां से होती है।
लेकिन कागज के नोट छापने की भी एक सीमा होती है। अगर बहुत मात्रा में इसे प्रसार मिल गया तो इसके अमूल्यन होने के कारण महंगाई कई गुना बढ़ सकती है। इस समस्या को दूर करने के लिए 1821 में इंग्लैंड ने, जो कि उस वक्त वैश्विक फाइनेंस का गुरु था, गोल्ड स्टैंडर्ड की शुरुआत की। इसके तहत जितने नोट छापे जाते थें उसके वैल्यू के अनुपात में उतने ही सोने को रिजर्व में रख दिया जाता था। इससे अप्रत्याशित तौर पर नोटों को छापने की समस्या पर लगाम लगाया जा सका। इस प्रक्रिया ने वैश्विक व्यापार में देशों के बीच में आपसी विश्वास को बनाए रखने में भी मील के पत्थर का काम किया। अब कोई भी देश अपनी मर्जी के अनुसार कितना भी नोट छापने के लिए स्वतंत्र नहीं थें। लेकिन गोल्ड स्टैंडर्ड ने इंटरनेशनल फाइनेंस के एक वृहत कमी को भी हम लोगों के सामने ला दिया। अब दुनिया के सारे देश एक दूसरे से इस तरह से जुड़ चुके थें कि अगर दुनिया के किसी एक कोने में आर्थिक मंदी आती है तो उस का दंश सारी दुनिया को झेलना पड़ता था। यह बात 1929 के ग्रेट डिप्रेशन ने हमें बहुत ही सधे हुए तरीके से समझा दिया। इसका नतीजा यह हुआ कि 1970 के आते-आते दुनिया ने गोल्ड स्टैंडर्ड से तौबा करने में ही अपनी भलाई समझी। (Courtesy Britannica)
आज ज़माना कैशलेस दुनिया का है। मतलब हम लोग तेजी के साथ एक ऐसे वर्ल्ड ऑर्डर में प्रवेश कर रहे हैं जहां वास्तविक मुद्रा का कोई महत्व नहीं रह जाएगा। वहां सिर्फ क्रेडिट कार्ड, डेबिट कार्ड, चेक, डिमांड ड्राफ्ट, आरटीजीएस, एनईएफटी, यूपीआई, ई-वॉलेट, मोबाइल वॉलेट का ही बोलबाला होगा। अमेरिका आज 55% कैशलेस है, इंग्लैंड 60% जबकि भारत मात्र 5%। मार्च 2023 के बाद स्वीडन दुनिया का एकमात्र ऐसा देश होगा जो पूरी तरह कैशलेस होगा। इसके कई फायदे हैं। सर्वप्रथम तो किसी देश को मुद्रा छापने और उन्हें विभिन्न बैंकों और उन्हें वितरित करने के लिए जरूरी ठिकानों पर पहुंचाने में लगने वाले हजारों करोड़ रुपयों की बचत होगी। कैशलेस के कारण किसी देश की जो अर्थव्यवस्था होगी वह पूरी तरह से फॉर्मल होगी। मतलब अगर हमारी कार में एक पंक्चर भी बनाया जाएगा तो वह भी अकाउंटेबल होगा। टैक्स की चोरी बिल्कुल नहीं हो सकती है। घपलों और घोटालों पर पूरी तरह से नकैल कस दी जाएगी।
इतिहास में कभी ऐसा भी एक दिन था जब हम लोग मुद्रा विहीन थें। ठीक उसी प्रकार आज हम लोग एक ऐसे वर्ल्ड-ऑर्डर की तरफ धीरे-धीरे अग्रसर हैं जब दुनिया पूरी तरह से मुद्राविहीन हो जाएगी। ऐसा बिल्कुल नहीं कहा जा सकता कि इसमें 50 साल लगेंगे या 70 साल पर होगा यह जरूर। लेकिन, हम सिर्फ वास्तविक मुद्दाविहीन होंगे न की आभासी मुद्राविहीन। आभासी मुद्रा की सल्तनत इसी प्रकार और विराट, और विकराल होती जाएगी।

