- मनोज कुमार श्रीवास्तव
जातिवाद, परिवारवाद, भ्रष्टाचार, दलबदल,दलों में आंतरिक लोकतंत्र का अभाव आदि लोकतंत्र को कमजोर कर रहे हैं। भारत जनसंख्या के हिसाब से विश्व का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश है। चीन भारत से बड़ा लोकतांत्रिक देश बन सकता था लेकिन स्टालिन को पीछे छोड़ते हुए माओत्सेतुंग और चाऊ एन लाई तानाशाही में आगे निकल गए थे।अभी जिन एशियाई-अफ्रीकी देशों में लोकतांत्रिक व्यवस्था जिंदा है ,भारत उनमें आगे है।
भारत में न तो कभी फौजी तख्तापलट की नौबत आई और न सत्तारूढ़ नेताओं को देश छोड़कर भग्न पीडीए है।बावजूद भारत का लोकतंत्र पूर्णरूपेण स्वस्थ नहीं है।लेकिन पड़ोसी देशों पर नजर डालें तो आश्चर्य होगा कि जो देश सदियों तक भारत का हिस्सा रहे हैं, भारतीय संस्कृति में पले-बढ़े हैं वहाँ लोकतंत्र या तो लकवाग्रस्त हो गया है या शिथिल पड़ गया है।
पाकिस्तान, बांग्लादेश, म्यंमार की तरह श्रीलंका में फौजी शासन कभी नहीं आया लेकिन आज वहां जैसी अराजकता फैली हुई है वैसा दक्षिण एशिया के किसी देश में पहले नहीं हुई है।पाकिस्तान का लोकतंत्र तो शुरू से हीं लड़खड़ाया हुआ है।दो-तीन बार तो वहां फौजी तख्तापलट हुआ है और बाकी शेष समय लोकतांत्रिक सरकार बनी पर हमेशा फौज के नीचे दबी रही।इमरान खान का आना-जाना फौज का देंन है।
पाकिस्तान में जो नागरिक सरकार बनी वे परिवारवाद से ग्रसित रही ।अभी वर्तमान में जो चल रही है वे दलबदल के दम पर है। ब्रिटिश लोकतंत्र आधुनिक दुनिया का सबसे पुराना और सबसे स्वस्थ लोकतंत्र है।न तो वहाँ दलबदल हुआ और न फौजी तख्तापलट ,और न महारानी नें कभी प्रधानमंत्री को हटाया।बोरिस जॉनसन को स्वयं इस्तीफे की घोषणा करनी पड़ी।क्योंकि पार्टी में बगावत हो गई।यदि इस्तीफा नहीं देते तो तो उन्हें धक्का देकर बाहर करने के अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं था।
आजादी के 75 साल बाद भी यह दावा करना मुश्किल है कि भारत वास्तव में एक लोकतांत्रिक देश है।यह बात सही है कि इसने हर क्षेत्र में कई उपलब्धियां हासिल की है फिर भी जब भूख से बेहाल,आंसुओं से लबालब भरी आँखें नए धनाढ्यों की ओर घूरते हैं हम सोचने पर मजबूर हो जाते हैं कि हम आज खान खड़े हैं।जनसंख्या का एक बड़ा हिस्सा आज भी विकास की मुख्यधारा से बाहर है।
लोकतंत्र की खामियां विशेष रूप से इसके संचालन में नहीं पायी जाती है बल्कि इसको चलाने वाले लोगों के चरित्र और कार्यप्रणाली में होती है।आजादी के जिन उच्च आदर्शों की स्थापना हमें देश और समाज के लिए करनी चाहिए थी ठीक उसके विपरीत दिशा में हम जा रहे हैं।भ्रष्टाचार, दहेज, मानवीय घृणा, हिंसा,अश्लीलता और कामुकता तो हमारी राष्ट्रीय विशेषतायें बनती जा रही है।
गाँवों से शहरों की ओर पलायन था अक्ल परिवारों की स्थापना की प्रवृत्ति पनप रही है।जिसके कारण संयुक्त परिवारों का विघटन शुरू हुआ है। इससे सामाजिक मूल्यों की क्षति पहुंच रही है। 74 वर्षों में हमने सामान्य लोकतंत्रीय आचरण भी नहीं सीखा है।आज जब भारत में शिक्षा का प्रसार हो गया है और उसे विश्व की आर्थिक महाशक्तियों की कतार में बैठने के योग्य मन जा रहा है दुर्भाग्य से उसके संसदीय लोकतंत्र की जड़ें कमजोर पड़ती जा रही है।
संसद के दोनों सदनों में अक्सर विधायी कामकाज या देश और समाज के सामने खड़े ज्वलंत मुद्दों पर सार्थक चर्चा होने के बजाय हो-हल्ला, वॉक आउट,और अंततः पीठासीन अधिकारी द्वारा कार्यवाही का स्थगन ही अधिक होता है।प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू संसदीय लोकतंत्र की परम्पराओं के पालन और उनके संरक्षण के प्रति गम्भीर थे। उनकी पूरी कोशिश रहती थी कि संसद का सत्र चलते समय यदि वे दिल्ली में हैं तो सदन में अवश्य उपस्थित रहे।
लेकिन नेहरू जी की बेटी इंदिरा गांधी ने प्रधानमंत्री बनने के बाद इस परंपरा के प्रति जरूरी गम्भीरता नहीं दिखाई और उनके बाद से यह लगातार क्षीण होती गई। शून्यकाल और प्रश्नकाल का सरकारी जवाबदेही सुनिश्चित करने के हथियार के रूप में विकसित करने और उसका कारगर इस्तेमाल करने के काम मे मधु लिमये,जार्ज फर्नांडिस और ज्योतिर्मय बसु जैसे सांसदों ने विशेष रूप से ख्याति अर्जित की।
अब संसद में महत्वपूर्ण और ज्ञानवर्धक चर्चायें बहुत कम देखने को मिलती है।इस कारण जनता की निगाह में संसद और सांसदों की प्रतिष्ठा गिरी है।सरकार और उसके विभागों में व्याप्त भ्रष्टाचार संसद में भी प्रवेश कर गया है।

