मैं क्यों हूँ, मैं जो हूँ: भारतीय स्वाधीनता के 75 वर्ष-5

आलेख

  • नीरज सिंह

भारतीय संस्कृति में दूध का विशेष महत्व है। हमारा कोई भी पूजा-पाठ गाय के दूध के बिना पूर्ण नहीं माना जाता है। कहा जाता है कृष्ण के द्वापर युग में दूध की नदियाँ बहा करती थीं। व्यवहारिक तौर पर और साइंटिफिकली भी दूध को उसकी पौष्टिकता के कारण एक कंपलीट फूड की संज्ञा दी गई है। शायद यही कारण है कि बच्चे भी जन्म के बाद 6 महीने तक सिर्फ माँ की दूध पर ही पलते हैं।

मनुष्य जिन जानवरों के दूध को अपने व्यवहार में लाता है उनमें मुख्यतः गाय, भैंस, बकरी हैं। परंतु कुछ स्थानीय अनुसूचित जातियाँ या जनजातियाँ अन्य जानवरों के दूध का भी उपयोग करती हैं, जिनमें घोड़ी, याक, गधी, ऊंटनी, भेंड़ मुख्य हैं। आजकल सिर्फ खेती किसानी के मात्र एक सहयोगी से बहुत आगे निकल कर दुग्ध उत्पादन कुछ देश की अर्थव्यवस्थाओं को बहुत ही खास तरीके से प्रभावित कर रहा है। हमें यह बात कहने में फक्र होना चाहिए कि भारत उन देशों में सारी दुनिया में सर्वप्रथम है। जहां 1950-51 में हमारे देश में दूध का उत्पादन मात्र 1.70 करोड़ टन हुआ करता था, वहीं आज हम 21 करोड़ टन तक का उत्पादन करने में सक्षम हैं। यह संपूर्ण विश्व के कुल दूग्ध उत्पादन यानी 84.30 करोड़ टन का 25% बैठता है। इसके बाद के अन्य देश दुग्ध उत्पादन के मानक पर अमेरिका (9.8 करोड़ टन), पाकिस्तान (4.5 करोड़ टन), चीन (3.5 करोड़ टन) और ब्राजील (3.4 करोड़ टन) हैं। भारत का डेयरी उद्योग 2020 तक संपूर्ण देश के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का अन्य कारकों की तुलना में 4.2% के लिए उत्तरदायी था और सकल कृषि उपज का 20%। इनमें उत्पादकता के अनुसार हम मुख्यत: गाय-भैंसों को विभिन्न श्रेणियों में विभक्त कर सकते हैं :- देसी भैंस (35%), संकर नस्ल की गाय (26%), अन्य भैंस (14%), देसी गाय (10%), अन्य गाय (10%), बकरी (4%), विदेशी गाय (1%)

1875 में भारत में मवेशियों की क्रॉस-ब्रीडिंग शुरू हो चुकी थी। परंतु, 1961 से पहले देश के नीति-निर्माताओं ने इसे ज़्यादा तवज्जो नहीं दी। आधुनिक दूध प्रसंस्करण और विपणन तकनीकों को अपने देश में 1920 के दशक में ही शुरू कर दिया गया था। 1946 में गुजरात के आणंद में भविष्य के संपूर्ण देश के ऑपरेशन फ्लडका बीजारोपण हो चुका था, जिसकी औपचारिक घोषणा 1969 में मिल्क मैन ऑफ इंडियावर्गीज कुरियन के श्रीमुख से होनी थी। उन दिनों देश के दूध उत्पादक किसान निजी दुग्ध संयंत्रों और विक्रेताओं की शोषणकारी प्रवृत्ति के निशाने पर थें। ऐसे शोषितों के लिए डेयरी सहकारी समितियां किसी मुंह मांगी मुराद से कम नहीं थीं। नेशनल डेयरी डेवलपमेंट बोर्डकी स्थापना तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की दूरदर्शी नेतृत्व के तहत 1965 में हो चुकी थी। क्रांति शनै-शनै जोर पकड़ रही थी। आणंद मॉडल त्री-स्तरीय व्यवस्था की हिमायती थी। (क) ग्राम-स्तरीय सहकारी समितियां (प्राथमिक उत्पादक), (ख) जिला-स्तरीय सहकारी उत्पादक संघ (दूध एकत्र करने वाले एवं प्रसंस्करण संयंत्र चलाने वाले), (ग) विपणन के लिए राज्य स्तरीय संघ।

ऑपरेशन-फ्लडया श्वेत-क्रांतितीन चरणों में आगे बढ़ी। पहले चरण (1970-1981) के दौरान नई दिल्ली, कोलकाता, मुंबई और चेन्नई के आसपास के क्षेत्रों में सहकारी समितियों को स्थापित करने पर ध्यान केंद्रित किया गया। दूसरे चरण के दौरान 147 अन्य शहरी केंद्रों तक विस्तार किया गया। तीसरे चरण, जो 90 के दशक के मध्य तक चला, के दौरान अन्य छोटे और मध्यम शहरों तक भी सहकारिता का जाल बिछा दिया गया। संपूर्ण क्रांति का वित्तपोषण भारत सरकार के साथ-साथ विश्व बैंक और यूरोपीय आर्थिक समुदाय के द्वारा भी हुआ। तत्पश्चात, 1997 में भारत ने दूध उत्पादन में अमेरिका को पीछे छोड़ दिया और सारी दुनिया में अव्वल बन गया।

हमारे दुग्ध उत्पादन तंत्र में भैंसों का सारी दुनिया में विशेष स्थान है। उनके दूध में वसा की मात्रा 7.5 प्रतिशत होती है जो की गायों से दोगुनी है। वे कम गुणवत्ता वाले चारे पर भी बढ़िया उत्पादन दे सकती हैं। उन्हें पालना भी कम खर्चीला होता है। 2013 तक हमारे संपूर्ण दुग्ध उत्पादन का लगभग 50% भैंसों से आता था। पनीर और खोवा जैसे उच्च वसा वाले डेयरी उत्पादों के लिए इनके दूध को विशेष तौर पर पसंद किया जाता है। हालांकि, रसगुल्ले के लिए गाय के दूध को ही प्राथमिकता दी जाती है।

अगर भारत के व्हाइट रिवॉल्यूशनया ऑपरेशन फ्लडके लिए किसी एक व्यक्ति को उत्तरदाई माना जाएगा तो वह सिर्फ और सिर्फ वर्गीज कुरियन (1921-2012) हैं। उन्होंने एक सधे हुए प्रशासक की तरह गुजरात के छोटे से शहर आणंद से क्रांति की अगुवाई करते हुए उसे सारे देश में फैला दिया और 1970 से 2000 के बीच मात्र 3 दशकों में हमारे दुग्ध उत्पादन को 4 गुने तक बढ़ा दिया। भविष्य के कोऑपरेटिव मैनेजरों को तैयार करने के लिए 1979 में उन्होंने इंस्टिट्यूट ऑफ़ रूरल मैनेजमेंट आणंद (IRMA) की आधारशिला रखी। केंद्र में 2014 में आई बीजेपी के सरकार ने भी इस दिशा में बेहतर काम किया है जब उसने मात्र 8 साल में ही दुग्ध उत्पादन 44% तक बढ़ा दिया। इस क्रांति का सबसे खूबसूरत हिस्सा यह है कि इसमें 70% तक वर्कफोर्स महिलाओं का है। इस आंदोलन में बिचौलिए कहीं नहीं हैं और 100 में से 70 सीधे-सीधे किसानों के खाते में जाता है। यह बात इस क्रांति को और ज्यादा विशेष बना देती है कि इसमें बड़े किसानोंके द्वारा नहीं बल्कि ज्यादा किसानोंके द्वारा उत्पादन पर जोर दिया जाता है। मतलब, एक, दो या तीन मवेशी वाले किसानों की इसमें बहुतायत है। अमूल अपने उत्पादों के बल पर आज एक मल्टीनेशनल कंपनी बन चुकी है। कर्नाटक की नंदिनी‘, राजस्थान का सारसऔर बिहार की सुधादुग्ध उत्पादक इकाइयां आज किसी परिचय की मोहताज़ नहीं हैं। सारे देश में मदर डेयरी का एक अलग ही स्थान है। आजादी के वक्त जब देश की जनसंख्या मात्र 35 करोड़ थी उस वक्त प्रति व्यक्ति प्रतिदिन दूध की खपत मात्र 124 ग्राम थी। आज 135 करोड़ की जनसंख्या होने के बावजूद हमारी दूध की खपत लगभग 4 गुने के बराबर 417 ग्राम प्रति व्यक्ति प्रतिदिन है। कूरियन को उनके महान कार्य के लिए कृतज्ञ राष्ट्र उनके जन्मदिन 26 नवंबर को राष्ट्रीय दुग्ध दिवसके रूप में मनाता है।

मनुष्य को आदि काल से ही प्रकृति एक पाठ हमेशा पढ़ाती आई है, कि किसी भी परिवर्तन या प्रगति कि कोई न कोई कीमत हमें चुकानी पड़ती है। हमारी श्वेत-क्रांतिइसकी अपवाद नहीं है। हमारे मुल्क में देसी नस्लों की गायों की संख्या लगातार कम हो रही है और विदेशी एवं क्रॉस-ब्रेड नस्लों की संख्या बढ़ रही है। देसी गाय प्रतिदिन 3.73 किलोग्राम दूध का उत्पादन करती हैं जबकि क्रॉस-ब्रेड गायों के लिए यही आंकड़ा 7.61 किलोग्राम है और विदेशी नस्लों के लिए तो 11.48 किलोग्राम है। लेकिन देसी गायों के दूध का पोषण मूल्य अधिक होता है, इसलिए उनकी घटती आबादी का भविष्य में स्वास्थ्य और पर्यावरण पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा, ऐसा विशेषज्ञ बताते हैं। हालांकि पशुओं की क्रॉस-ब्रीडिंग भी जरूरी है। इससे गर्भाधान में बढ़ोतरी होती है, शुष्क अवधि कम होती है और स्तनपान की अवधि अप्रत्याशित तौर पर बढ़ जाती है।

गायों की उत्पादकता को हम दो बियानों के बीच दिए गए औसत दूध के अनुसार तय करते हैं। इस पैमाने पर हम अन्य मुख्य दुग्ध उत्पादक देशों से पिछड़ते हुए से प्रतीत होते हैं। भारत में गाय का एक ब्यांत का औसत दुग्ध उत्पादन जहां 1100 लीटर है वहीं पाकिस्तान का 2200 लीटर, अमेरिका का 9000 लीटर और इज़राइल का तो 11000 लीटर है। मतलब, हमारे यहाँ प्रति गाय दुग्ध उत्पादन बहुत ही कम है। इससे एक बात तो साफ है कि दुनिया में आज नंबर वन होने के बावजूद हमारे यहाँ अभी भी दुग्ध उत्पादन को बढ़ाने की असीम संभावनाएँ हैं। कौन जानता है एक और अदद फ्लड-रिवॉल्यूशनहमारे दरवाजे पर दस्तक दे रहा हो।

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