पटना के ऐतिहासिक गांधी मैदान से ‘जेपी’ने किया था ‘संपूर्ण क्रांति’ का आह्वान

देश

-मुरली मनोहर श्रीवास्तव

बिहार में लोकनायक जय प्रकाश नारायण के नेतृत्व में 1974 में शुरू किए गए जनांदोलन को शुरुआती दौर में सभी ने काफी हल्के में लिया। यह भी आरोप लगा कि इसमें अमेरिकी खुफिया एजेंसी सी.आई.ए. का हाथ है। मगर अफवाहों से अलग जेपी ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा और गांधीवादी शैली पर ‘न मारेंगे, न मानेंगे’ के आधार पर जे.पी. का आंदोलन धीरे-धीरे जोर पकड़ता गया। इस आंदोलन ने कई नारे दिए और संकल्प व्यक्त किए, जो वर्षों चर्चा में रहा। ‘हमला चाहे जैसा हो, हाथ हमारा नहीं उठेगा’, “संपूर्ण क्रांति अब नारा है, भावी इतिहास हमारा है’, ‘लोक व्यवस्था जाग रही है, भ्रष्ट व्यवस्था कांप रही है’, ‘सच कहना अगर बगावत है तो समझो हम भी बागी हैं। 

सम्पूर्ण क्रान्ति जयप्रकाश नारायण (जेपी) का विचार व नारा था जिसका आह्वान उन्होंने इंदिरा गांधी की सत्ता को उखाड़ फेकने के लिये किया था. लोकनायक नें कहा कि सम्पूर्ण क्रांति में सात क्रांतियां शामिल हैं- राजनैतिक, आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, बौद्धिक, शैक्षणिक व आध्यात्मिक क्रांति. जयप्रकाश नारायण की पहचान एक ऐसे राजनेता व राजनीतिक चिंतक के रूप में की जाती है, जिन्होंने सर्वोदय के विचारों का प्रबल समर्थन किया है. “सर्वोदय का अर्थ है, सभी का कल्याण. “ यह वह आंदोलन था, जिसका लक्ष्य ग्रामीण पूर्ण निर्माण, शांतिपूर्ण और सहकारी माध्यमों से ग्रामीण भारत के लोगों को ऊपर उठाना था.

                                                          जे.पी. ने  पटना के ऐतिहासिक गांधी मैदान में संपूर्ण क्रांति का आहवान किया था. मैदान में उपस्थित लाखों लोगों ने जात-पात, तिलक, दहेज और भेद-भाव छोड़ने का संकल्प लिया था. उसी मैदान में हजारों-हजार ने अपने जनेऊ तोड़ दिये थे.

उस वक्त सबकी जुबां पर बस एक ही नारा था :-

जात-पात तोड़ दो, तिलक-दहेज छोड़ दो.

समाज के प्रवाह को नई दिशा में मोड़ दो.

सम्पूर्ण क्रांति की तपिश इतनी भयानक थी कि केन्द्र में कांग्रेस को सत्ता से हाथ धोना पड़ गया था. जय प्रकाश नारायण जिनकी हुंकार पर नौजवानों का जत्था सड़कों पर निकल पड़ता था. बिहार से उठी सम्पूर्ण क्रांति की चिंगारी देश के कोने-कोने में आग बनकर भड़क उठी थी. जेपी के नाम से मशहूर जयप्रकाश नारायण घर-घर में क्रांति का पर्याय बन चुके थे.

हिंदी के बड़े कवि दुष्यंत कुमार ने कभी जेपी के लिए लिखा था, ‘एक बूढ़ा आदमी है मुल्क में या यूं कहे इस अंधेरी कोठरी में एक रोशनदान है.’

जेपी आंदोलन में जिन नेताओं ने अपनी महत्ती भूमिका निभायी और जो उभरकर सामने आए उनमें नीतीश कुमार, लालू प्रसाद, रामविलास पासवान को तो सभी लोग जानते हैं, मगर उस दौर में लालमुनी चौबे विधानसभा के सदस्य थे ने इस आंदोलन के दौर में जेपी को अपना इस्तीफा सौंप दिया था। जबकि सुशील कुमार मोदी और पेश से पत्रकार, राजनेता, उद्योगपति आर.के.सिन्हा भी जेपी की पाठशाला से ही निकले मेधावी राजनेताओं में शुमार हैं।

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