ये दुनिया नफ़रतों के आख़री स्टेज पे है
इलाज इस का मोहब्बत के सिवा कुछ भी नहीं है
(चरण सिंह बशर का एक शेर)
कला-संस्कृति और साहित्य किसी भी समाज का आईना होता है, कोई समाज कितना ज़िन्दा है यह बात पता करने का माध्यम भी यही है क्योंकि केवल सांस लेने मात्र को ज़िन्दा रहना नहीं कहते। – – – एक समय की बात है। एक रचनाकार ने एक शानदार रचना की। उस रचना को पूरे विश्व में कहीं भी गंभीरता से नहीं लिया गया, लेकिन एक देश में उस रचना की इतनी चर्चा हुई कि उसके बाद पूरे विश्व ने न केवल उस रचना को गंभीरता से लिया बल्कि धीरे-धीरे लोगों को उसकी महत्ता समझ में आई और आज वो रचना विश्व की क्लासिक रचनाओं में से एक मानी जाती है। कल कुछ ऐसा ही घटित हुआ हाउस ऑफ़ वेराइटी और दस्तक पटना द्वारा आयोजित बैठकी में।
बैठकी हाउस ऑफ़ वेराइटी और दस्तक का एक महत्वपूर्ण आयोजन है, जिसमें कला, संस्कृति और साहित्य से जुड़े व्यक्तित्व के साथ खुले मन से बातचीत की जाती है। यह आयोजन कला और संस्कृति के सम्वर्धन और विकास के लिए समर्पित स्थान हाउस ऑफ़ वेराइटी, पटना के शुरुआत के साथ ही शुरू हुआ है। कल यह बैठकी रंगमंच और फ़िल्म अभिनेता संजय सोनू के साथ आयोजित था और कमाल की बात यह कि पूरा सभागार पटना के रंगकर्मियों और रंग-प्रेमियों से खचाखच भरा हुआ था। यह इस आयोजन के साथ ही साथ संजय सोनू की सहजता और लोकप्रियता का साक्षात् उदहारण भी प्रस्तुत करता है और एक ऐसे समय में जहां दर्शकों और श्रोताओं के कमी का माहौल चल रहा है, वैसे समय में बैठकी जैसे आयोजन में इतनी संख्या में उपस्थिति हमें यह कहने पर मजबूर करती है – पटना ज़िन्दा है। वैसे पटना अपने गंभीर गोष्ठियों और विमर्शों के आयोजन के लिए भी प्रसिद्ध रहा है और उसे अपनी इसी परम्परा का निर्वाह करते हुए देखना किसी भी कलाकार और कला-प्रेमी के लिए बेहद सुखद है। कल भारी संख्या में लोग संजय सोनू की बैठकी में शामिल हुए, यह हम सबके लिए गौरव का विषय है। जहां तक प्रश्न हम सबके प्यारे सोनू भैया का है तो उनके लिए यह शेर अर्ज़ है
अच्छी सीरत को सँवरने की जरूरत क्या हैं
सादगी में भी कयामत की अदा होती हैं
संजय सोनू, जन्म 15 अगस्त 1970, एक प्रमुख भारतीय रंगमंच और फ़िल्म अभिनेता, निर्देशक और प्रशिक्षक हैं। इनके रंग मंचीय जीवन की शुरुआत सन 1986 में “विशाल नाट्य मंच, पटना” से हुई। उसके बाद इन्होंने “निर्माण कला मंच, पटना” से जुड़कर काम किया और बाद में पटना का महत्वपूर्ण नाट्य दल “थियेटर यूनिट” के संस्थापक सदस्य रहे। 1986 से लेकर 1997 तक पटना रंगमंच पर सक्रिय कर्मठ रंगकर्मी का नाम है संजय सोनू। 1994 में इनका चयन राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, नई दिल्ली में हो जाता है और वहां वो 1994 से 1997 तक बतौर अभिनेता प्रशिक्षण और 1997 में राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (NSD) से अभिनय विषय में स्नातक किया और 1997 में मुंबई का रुख।
30 से अधिक वर्षों के पेशेवर थिएटर अनुभव और 20 से अधिक वर्षों के फिल्म अनुभव के साथ, संजय सोनू का योगदान रंगमंच और सिनेमा में महत्वपूर्ण है। मुम्बई में रहते हुए भी इनका सम्बन्ध कभी रंगमंच से ख़त्म नहीं हुआ बल्कि समय-समय पर विभिन्न समूहों के साथ इन्होंने प्रशिक्षण, प्रकाश-परिकल्पना, निर्देशन आदि का कार्य चुपचाप करते रहे। अभी हाल ही में इन्होंने जम्प नामक नाटक में अभिनय किया है, इस दो पात्र के नाटक का प्रदर्शन अभी लगातार जारी है।
क़िस्से-कहानियों का दौर चला तो संजय सोनू ने जीवन, रंगमंच और सिनेमा को लेकर अपने अनुभव साझा किए और साथ ही कुछ बेहद रोचक क़िस्से भी सुनाए, जिसे पटना रंगमंच की पांच पीढ़ी सुन रही थी। दर्शक दीर्घा में 65 से लेकर 5 साल तक के श्रोता शामिल थे। वरिष्ठ नाट्य निर्देशक और परिकल्पक परवेज़ अख़्तर, उमाकांत झा, सुमन सिन्हा, ज़िया हसन, निलेश मिश्रा, धूर्व कुमार, पवन कुमार, पारस, राजेश राजा, अजित कुमार, आदिल रसीद और संजय कुमार आदि समेत खचाखच भरे सभागार ने (सबका नाम लिखना संभव नहीं है) न केवल संजय सोनू को ध्यानपूर्वक सुना बल्कि उनके के बारे में, उनसे संबंधित अपनी राय और यादें भी ज़ाहिर की और बातों ही बातों में दो घंटे का वक्त कब बीत गया, पता ही नहीं चला। अब इतने अच्छे आयोजन के पश्चात अच्छे से और जमकर खाना ना खाया जाए तो फिर मज़ा ही क्या है, तो हाउस ऑफ वेराइटी के सौजन्य से खाना भी हुआ लेकिन अफ़सोस कि हम चाहकर भी इसमें सबको शामिल नहीं कर पाए।
इस प्रकार के आयोजन साथ बैठने, एक दूसरे से मिलने-जुलने, जानने-समझने और एक दूसरे से खुलकर बातचीत करने में सहायक सिद्ध होते हैं, यही इसकी सार्थकता है और शायद इसीलिए आज ऐसे आयोजनों की सबसे ज़्यादा आवश्यकता है। अबुल मुजाहिद ज़ाहिद साहब का एक शेर कुछ यूं है –
एक हो जाएँ तो बन सकते हैं ख़ुर्शीद-ए-मुबीं
वर्ना इन बिखरे हुए तारों से क्या काम बने

