लोकतंत्र में लोक अदालत का बढ़ता दायरा

आलेख

-मनोज कुमार श्रीवास्तव

लोक अदालत का महत्व लगातार बढ़ते जा रहा है क्योंकि यह विवादों को सुलझाने का एक प्रभावी, त्वरित और किफायती तरीका प्रदान करता है।यह न्यायपालिका पर बोझ को कम करने और आम आदमी को न्याय सुलभ बनाने में मदद करती है।जिससे अदालतों में लंबित मामलों की संख्या कम होती है।लोक अदालत में वाद दायर करने के लिए कोई कोर्ट फीस नहीं लगती और न ही वकीलों पर खर्च करना पड़ता है।
लोक अदालत का मुख्य उद्देश्य समझौता करना है।जिससे दोनों पक्षों को आपसी सहमति से विवाद का हल मिल जाता है।लोक अदालतें समाज के कमजोर वर्गों को न्याय दिलाने में मदद करती है जो महंगी अदालती कार्य नहीं वहन कर्नाड में सक्षम नहीं होते हैं।लोक अदालतें पारिवारिक विवादों जैसे कि तलाक, गुजर भत्ता और बच्चों की कस्टडी जैसे मामलों को सुलझाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
लोक अदालत भारतीय न्याय प्रणाली का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन गई है।इनका बढ़ता महत्व इस बात का प्रमाण है कि वे न्याय प्रदान कर्नाड ऑफ सामाजिक सद्भाव बनाये रखने में कितने प्रभावी हैं।लोक अदालत की अवधारणा विश्व न्याय शास्त्र में एक अभिनव भारतीय योगदान है।लोक अदालतों की शुरुआत ने इस देश की न्याय व्यवस्था में एक नया अध्याय जोड़ा और पीड़ितों को उनके विवादों के संतोषजनक समाधान के लिए एक पूरक मंच प्रदान करने में सफलता मिली।
यह वैकल्पिक विवाद समाधान (ADR) प्रणाली के घटकों में से एक है।प्राचीन काल में विवादों को “पंचायतों” के पास भेजा जाता था जो गांव स्तर पर स्थापित किये गये थे।पंचायते मध्यस्थता के माध्यम से विवादों का समाधान करती थी।यह मुकदमेंबाजी क् एक बहुत ही प्रभावी विकल्प साबित हुआ है।मध्यस्थता, बातचीत या पँचनिर्णय के माध्यम से विवादों कद निपटारे की यह अवधारणा लोक अदालत के दर्शन में अवधारणा और संस्थागत है।इसमें वे लोग शामिल होते हैं जो विवाद समाधान से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित होते हैं।
लोक अदालतों की अवधारणा आजादी से पहले और खासतौर पर ब्रिटिश शासन के दौरान पिछली कुछ शताब्दियों में गुमनामी में चली गयी थी।अब इस अवधारणा को एक बार फिर से पुनर्जीवित किया गया है।यह वादियों के बीच बहुत लोकप्रिय और परिचित हो गई है।यह वह प्रणाली है जिसकी जड़ें भारतीय विधिक इतिहास में गहरी है और यह भारतीय लोकाचार में न्याय की संस्कृति और धारणा के प्रति गहरी निष्ठा रखती है।अनुभव से पता चला है कि यह बहुत ही कुशल और महत्वपूर्ण ADR तंत्रों में से एक है और भारतीय परिवेश, संस्कृति और सामाजिक हितों के लिए सबसे उपयुक्त है।
भारतीय में पहली लोक अदालत 14 मार्च 1982 को गुजरात के जूनागढ़ में आयोजित की गई थी।महाराष्ट्र ने 1984 में लोक न्यायालय की शुरुआत की।विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम 1987 के लागू होने से भारतीय संविधान के अनुच्छेद 39 ए में निहित संवैधानिक आदेश के अनुसार लोक अदालतों को वैधानिक दर्जा प्राप्त हुआ।यह अधिनियम समाज के कमजोर वर्गों की निःशुल्क एवं सक्षम कानूनी सेवाएं प्रदान करने के लिए कानूनी सेवा प्राधिकरणों के गठन का आदेश देता है तथा यह सुनिश्चित करता है कि आर्थिक या अन्य असमर्थताओं के कारण किसी भी नागरिक को न्याय प्राप्त करने के अवसर से वंचित न किया जाए।
साल 2002 में संसद ने विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम 1987 में कुछ संशोधन किये ताकि लोक अदालतों को सार्वजनिक उपयोगिता सेवाओं से सम्बंधित विवादों को निपटाने के लिए एक स्थायी निकाय बनाकर उन्हें संस्थागत बनाया जा सके।स्थायी लोक अदालतों को वही शक्तियां प्राप्त है जो लोक अदालतों को प्राप्त है।स्थायी लोक अदालतें निरन्तर मंचों के रजप मदन काम करती है।वे विवादों को अदालती मामलों में बढ़ने से पहले हल करने का काम करते हैं।स्थायी लोक अदालत मदन एक न्यायिक अधिकारी जैसे कि वर्तमान या सेवानिवृत्त न्यायाधीश और दो अन्य सदस्य होते हैं जो अक्सर कानूनी या सामाजिक मामलों में अनुभवी वकील या सामाजिक कार्यकर्ता होते हैं।
भारत में लोक अदालतों के पास एक व्यापक क्षेत्राधिकार है जो विभिन्न सिविल, आपराधिक और पारिवारिक विवादों को कवर करता है और इसमें 10 लाख रुपये का वित्तिय क्षेत्राधिकार है।लोक अदालतें न केवल मामलों के त्वरित समाधान में योगदान देती हैं बल्कि पारम्परिक अदालतों में लंबित मामलों को कम करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
साल का तीसरा राष्ट्रीय लोक अदालत 13 सितम्बर को लगने जा रहा है। प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश सह अध्यक्ष हर्षित सिंह एवं अवर न्यायाधीश सह सचिव नेहा दयाल जिला विधिक सेवा प्राधिकार बक्सर द्वारा आगामी राष्ट्रीय लोक अदालत में बहुसंख्यक मात्रा में वादों को निपटाने के लिए काफी जोर शोर से तैयारी की जा रही है।वैसे लोक अदालत में अधिक से अधिक वादों को निपटाया जा रहा है।लोक अदालत में वादों की संख्या दिन प्रति दिन बढ़ता जा रहा है।नेहा दयाल ने जागरूकता अभियान चलाकर लोगों से इस लोक अदालत में अधिक से अधिक संख्या में भाग लेकर अपने-अपने वादों को सुलह,समझौता एवं मध्यस्थता के माध्यम से समाप्त करने को बताया है।

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