शोध में नैतिक कृत्रिम बुद्धिमत्ता का उपयोग आवश्यक, लेकिन सतर्कता अनिवार्य – डॉ. दीपक कुमार श्रीवास्तव

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कोटाः राजकीय सार्वजनिक मण्डल पुस्तकालय, कोटा के संभागीय पुस्तकालय अध्यक्ष डॉ. दीपक कुमार श्रीवास्तव ने शोधार्थियों को संबोधित करते हुए कहा कि – कृत्रिम बुद्धिमत्ता एक माया है, और शोध कार्य में इसका उपयोग करते समय अत्यंत सावधानी बरतना आवश्यक है। शोधार्थियों को चाहिए कि वे किसी भी जानकारी का उपयोग करने से पूर्व उसे विश्वसनीय डेटाबेस से सत्यापित अवश्य करें, अन्यथा उनका बहुमूल्य शोधकार्य और परिश्रम संदेह और चुनौती का शिकार हो सकता है।

यह उद्गार उन्होंने ब्रेनवेयर विश्वविद्यालय, पश्चिम बंगाल के इंटरनल क्वालिटी एश्योरेंस सेल ,लाईब्रेरी प्रोफेशनल फाउंडेशन ,नई दिल्ली एवं सेंटर फॉर मल्टीडिसिप्लिनरी रिसर्च इनोवेशन के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित राष्ट्रीय वेबिनार में बतौर रिसोर्स पर्सन व्यक्त किए। वेबिनार का विषय था -एथिकल यूज़ ऑफ आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस एंड रोल ऑफ लाइब्रेरी इन लिटरेचर रिव्यू फॉर रिसर्च |

इस अवसर पर विश्वविधालय के कुलपति प्रोफेसर शंकर गंगोपाध्याय , शोध निदेशक डा राखी , कोन्फ्रेंस डायरेक्टर बंदना बासु , चेटी घोष एवं लाईब्रेरी प्रोफेशनल फाउंडेशन के प्रेसीडेंट डा अनिल झारोटिया ने संबोधित किया | डा झारोटिया ने बताया की 600 लोगो ने इस कान्फ्रेंस मे भाग लिया |

डॉ. श्रीवास्तव ने कहा कि यद्यपि कृत्रिम बुद्धिमत्ता ने शोध प्रक्रिया को सरल और त्वरित बनाया है, किंतु यह केवल एक सहायक उपकरण है, शोधार्थियों को स्वयं का विवेक और नैतिक जिम्मेदारी का पालन करते हुए किसी भी जानकारी को साझा करना चाहिए। उन्होंने विशेष रूप से इस बात पर बल दिया कि पुस्तकालयों की भूमिका आज के शोध परिवेश में और अधिक महत्वपूर्ण हो गई है, क्योंकि वे शोधार्थियों को प्रामाणिक, प्रमाणित एवं नैतिक जानकारी उपलब्ध कराने का आधार हैं।

उन्होंने कहा कृत्रिम बुद्धिमत्ता आपकी सहयोगी हो सकती है, लेकिन मार्गदर्शक नहीं। अतः शोध की गुणवत्ता बनाए रखने हेतु हर जानकारी का स्रोत, प्रामाणिकता और संदर्भ का गहन परीक्षण अत्यंत आवश्यक है।

डॉ. श्रीवास्तव ने शोधार्थियों को नैतिक दायित्वों, सही संसाधनों के चयन, और पुस्तकालय की उपयोगिता को लेकर भी जागरूक किया। उनका व्याख्यान शोध की दिशा में नवाचार, नैतिकता और डिजिटल संसाधनों के संतुलित उपयोग की प्रेरणा बनकर सामने आया।

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